Thursday, January 8, 2026

अजह्ञान चा - ध्यान का अभ्यास

Part–2 : ध्यान का अभ्यास

Ajahn Chah

4. शोर करता मन

एक शिष्य बोला, “ध्यान में मेरा मन बहुत शोर करता है।” Ajahn Chah मुस्कराए और बोले— “जंगल में पक्षी गाते हैं, क्या तुम उनसे चुप रहने को कहते हो?”

सीख: मन को चुप नहीं कराना है, उसे देखना और सुनना सीखना है।

5. मच्छर और करुणा

मच्छरों से परेशान होकर शिष्य बोला, “ये ध्यान भंग कर देते हैं।” Ajahn Chah बोले— “अगर करुणा ध्यान को तोड़ दे, तो वह ध्यान कैसा?”

सीख: सच्चा ध्यान करुणा से अलग नहीं होता।

6. चलते-फिरते ध्यान

उन्होंने कहा— “चलते समय जानो कि चल रहे हो, बोलते समय जानो कि बोल रहे हो।”

सीख: ध्यान कोई अलग क्रिया नहीं, जागरूक जीवन ही ध्यान है।

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समझ की शुरुआत

Ajahn Chah (अजान चा) थाईलैंड के एक महान बौद्ध भिक्षु और शिक्षक थे। वे थाई फ़ॉरेस्ट परंपरा के सबसे प्रभावशाली आचार्यों में गिने जाते हैं।

संक्षेप में

जन्म: 1918, थाईलैंड

निर्वाण (देहावसान): 1992

परंपरा: थेरवाद बौद्ध धर्म (Forest Tradition)

उनकी शिक्षा का सार

अनित्यता (सब कुछ बदलता है)

दुःख का कारण आसक्ति है

समाधान: जागरूकता, ध्यान और सीधा अनुभव

Ajahn Chah की खासियत थी—सरल भाषा, रोज़मर्रा के उदाहरण और गहरी स्पष्टता। वे कहते थे:

> “शांति कहीं बाहर नहीं मिलती—वह देखने वाले मन में ही प्रकट होती है।”

उनका प्रभाव

उन्होंने थाईलैंड में कई ध्यान मठ स्थापित किए, जिनमें Wat Nong Pah Pong प्रमुख है।

उनके शिष्यों ने पश्चिम में भी बौद्ध ध्यान को फैलाया।

आज भी उनकी बातें ध्यान, चिंता (anxiety) और बेचैनी से जूझ रहे लोगों के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती हैं।

Monday, January 5, 2026

बीमारी से निपटना

बीमारी से निपटना( Dealing with Disease)

(Dealing with Disease)

बीमारी कोई दंड नहीं है —
यह प्रकृति का नियम है।

जिस शरीर का जन्म हुआ है,
उसका बीमार होना स्वाभाविक है।

दर्द शरीर में होता है,
दुःख मन की प्रतिक्रिया से जन्म लेता है।

जब हम डर, घृणा और शिकायत को
सिर्फ़ देखना सीख लेते हैं,
तो दर्द बना रहता है
पर दुःख कम हो जाता है।

इलाज आवश्यक है,
पर उससे आसक्ति नहीं।

बीमारी भी
जागरूकता और बोध का
मार्ग बन सकती है।

“मैं बीमार हूँ” नहीं —
“बीमारी को जाना जा रहा है”
यही मुक्तिदायक दृष्टि है।

— अजहन सुमेधो
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