Thursday, March 10, 2016

उपदेशक प्रिय भी,अप्रिय भी।

उपदेशक जो उपदेश देता है,अनुशासन करता है, रास्ता बताता है, गलतियों से सावधान करता है, अशिस्टता व् अनाचार से दूर करता है, वह मनुष्य सत्पुरुषों को तो प्रिय होता है परंतु वही पुरुष असत्पुरुषों को अप्रिय होता है।
                 तथागत बुद्ध


Tuesday, March 8, 2016

विद्वान का साथ करें।

जो व्यक्ति आपके दोष उसी प्रकार से आपको बताये जिस प्रकार से वह किसी खजाने का पता बतावे तो ऐसे विज्ञ व्यक्ति की संगत करनी चाहिए।


Monday, March 7, 2016

पाप कर्म शीघ्र फल नहीं देते।


बुद्ध कहते हैं कि हमारे द्वारा किये गए पाप कर्मों का प्रतिफल हमें तुरंत मिले यह हमेशा संभव नहीं होता है।कई बार पाप कर्मों का दंड हमें इतने अधिक समय बाद मिलता है कि हमें समझ ही नहीं आता कि यह अप्रिय संयोग हमारे साथ ही क्यों हुआ।
हमारे साथ प्रिय या अप्रिय घटनाएं अनायास ही नहीं घटतीं हमारे कर्मों का फल ही होती हैं।
बुद्ध के अनुसार वास्तव में पाप कर्म जब तक फलित नहीं होते तब तक वो उसी प्रकार हमारा पीछा करते रहते हैं जैसे राख के ढेर में आग सुलगते हुए अपना ताप बनाये रखती है।


Thursday, February 11, 2016

धम्मपद गाथा 146




को नु हासो [किन्‍नु हासो (क॰)] किमानन्दो, निच्‍चं पज्‍जलिते सति।
अन्धकारेन ओनद्धा, पदीपं न गवेसथ॥

जलै जहाँ जब नित्य तौ, कहँ आनन्द हुलास ?
तम में तुम खोजत न किमि , दीप जु देत प्रकाश ॥

जहाँ प्रतिक्षण सब कुछ जल रहा हो , वहाँ कैसी हँसी ? कैसा आनन्द ? ऐ अविधारूपी अंधकार से घिरे हुए भोले लोगों , तुम ज्ञान रूपी प्रकाश द्धीप की खोज क्यों नही करते ?

What is laughter, what is joy, when the world is ever burning? Shrouded by darkness, would you not seek the light?